Poems by Arpana Sant Singh ( अर्पणा संंत सिंह )

Poems by Arpana Sant Singh ( अर्पणा संंत सिंह )
 
 
***
 
एक कोशिका
एक प्रकार कोशिकाओं से ऊतक
एक प्रकार ऊतकों से अंग
विभिन्न प्रकार के अंगों से जीव
जिसमें
विभिन्न प्रकार के तंत्र एवं ग्रंथि
खाद्य की भूख
प्रत्येक जीव में
शरीरिक ऊर्जा हेतु
किंतु मानव में
भूख है कई स्तर की
ताकि वह ऊर्जावान रहें
हर स्तर पर
शरीरिक
मानसिक
आध्यात्मिक
कभी कभी किसी
एक पर
पूर्ण रूप से निर्भर हो
तो आप अस्वस्थ्य के तिमिर गर्भ में समा जाते है
मानसिक स्वास्थ्य
शरीरिक स्वास्थ्य के
सामस्त प्रयास विफल हो जाते हैं
स्वयं ही एक चक्रव्यूह रचते हैं
अपनी निर्भरता से अपेक्षाओं की
जब उपेक्षा से
खण्डित होती है
विश्वास
अथाह प्रेम
भ्रम
तब तंत्रों और ग्रंथियों का
असंतुलन हमें कर जाती हैं
ग्रसित कई रोगों से
क्यों इस तरह का भावनात्मक जुड़ाव किसी से
क्यों इतना संवेदनशील होना
क्यों स्वाहा हो जाना
जो केवल कल्पना मात्र है
शाश्वत प्रेम
मनुष्य के किसी संबंध में नहीं
प्रेम हैं
किंतु
स्वार्थ के लिए
छल के लिए
मनोरंजन के लिए
ममत्व में भी लिप्त नहीं है
निस्वार्थ प्रेम
विलुप्ति के कगार पर निष्प्राण प्रेम
मात्र जीवित है
पशु-पक्षी के मातृत्व में
 
 
 
***
 
नित प्रतिदिन तुम्हारी प्रतिक्षा
पल पल हर एक पल
निंद्रा से जागने से
निंद्रा मे जाने तक
निंद्रा में भी स्वप्न तुम्हारे
कोई भी ऐसा क्षण नहीं
जब तुम्हारी अदृश्य अनुभूति न हो
 
नित प्रतिदिन तुम्हारी प्रतिक्षा
पल पल हर एक पल
अटल मेरा तुझ पर विश्वास
जितना मेरा प्रेम निस्वार्थ
तुझसे स्नेह जीवन मेरा
सखा तुम ही हो तुम ही स्वामी
करों या न करों मुझे स्वीकार
 
नित प्रतिदिन तुम्हारी प्रतिक्षा
पल पल हर एक पल
तेरा मुख नयनों मे समाहित
संसार के प्रत्येक सकारात्मकता में
साक्षात्कार हो केवल तेरा
प्रत्येक सत्य में दर्शन तेरा
हृदय की प्रत्येक स्पंदन तेरा
धमनियों में रक्त सा संचार तेरा
 
नित प्रतिदिन तुम्हारी प्रतिक्षा
पल पल हर एक पल
अवगत होती
तुम्हारे नयनों से
तुम्हारे हृदय से
तुम्हारे आत्मा तक की
प्रत्येक भावना और संवेदना से
तेरी आँखें अनुपम धन मेरा
 
नित प्रतिदिन तुम्हारी प्रतिक्षा
पल पल हर एक पल
तुम निश्चित ही
प्रतिक्षा को मेरे विराम देने
जीवन को सार्थकता देने आओंगे
स्वयं को समर्पित कर
अतुल्य होगा वह क्षण मेरा
 
अर्पणा संत सिंह
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