ठहराव.!!! / Vipin Kumar

Vipin Kumar

 

ठहराव.!!!

यह फासले हमारे तुम्हारे दरमियां
सिर्फ खामोशियों की नहीं
बखत दिलों की भी थी.

जबकि हम समझते रहे
सिर्फ ‘हम’ थे- सिर्फ ‘हम’.
हकीकत यह था- कि
तुम ‘तुम’ थे – मैं ‘मैं’ था
‘हम’ जैसा कुछ भी नहीं.

वक्त का गुजरना हमारे बीच अगर
हमारा इश्क था- तो
सवाल जायज था
“तो हमारा इश्क क्या था?”
“ कैलेंडर की गुजरती हुई तारीखों का ढेर?”
“ या फिर कोई सफर?
जिसमें हम थे तो,
पर मन और मंज़िलें अलग थी”.

अमूमन मुझे भी लगा
एक पल- उन दिनों
हमारा इश्क, हमारी शिद्दत
एक एहतराम था.
‘पर तुम्हारा इतनी आसानी से
चले जाना
और मेरा यू स्वीकार कर लेना’
उस पल यह एहसास हुआ की
जो कुछ था- जो कुछ भी
सिर्फ हवा का एक ठहराव था
सिर्फ एक ठहराव.

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