Poems by Dr. Aprilia Zank

Poems by Dr. Aprilia Zank
 
 
अगरबत्तियाँँ
 
आग सुलगा कर
सड़क के किनारे
वे सभी बैठे थे
कंधों पर अंधकार का बोझ
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
भुतहा एहसासों को
साझा करते हुए
क्षणिक आमिष ज्ञान की चुनौतियों को
चुभलाते हुए
 
सुगंधित लोबान और
अगरबत्तियों की चमक में
सड़क पिघलकर
रात की अस्थियों और ऊतकों में
समा जाती है
 
समय प्लास्टर के देवताओं को
चाटकर खोखला कर देता है
संगमरमर की लाशें
छिपकलियों को खिला दी जाती हैं
साँप की केंचुली के समान परंपराओं को
बारिश बहा ले जाती है
जहाँ लाल रेशमी कपड़े
जंग लगे बाड़ों पर
दम तोड़ रहे होते हैं
 
गुफाओं में
हज़ारों नेक और उदार
हाथियों की आँखें
आइवरी दुर्ग की दरारों से
टकटकी लगाकर देखती हैं
 
 
 
बैंकॉक की आखिरी रात
 
नदी तट पर होटल के
भींगे बरामदे पर
रंगों का छद्म खेल
आर्द्र जंगल की परछाइयों में
शाश्वतता की झलक
मानस-पटल पर तस्वींरें
बारिश मेंं मिलकर
घूमती हुई टपकती जाती हैं
और नदी की त्वचा पर तैरती हैं
 
विशाल धुंधली नदी
शांत कठोर
सौगंधों, प्रार्थनाओं, शामों
कबूतरों और गिद्धों के पंखों
और यादों के टुकड़ों से बोझिल
 
हम नये नहीं हैं
हम ब्रह्मांड के केन्द्र में भी नहीं
हमारे शब्द पहले हैं बोले जा चुके हैं
हमारे रूपकों में पुरानी पीढ़ियों की
प्रतिध्वनियाँ हैं
हमारा श्रेय
हमारी घृणा
इस अँधेरी अंतहीन नदी की
लहरें मात्र हैं
 
 
Translated into Hindi by Dr. Ranjana Sharan Sinha
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