ରାଜଶ୍ରୀ ମହାପାତ୍ର (है कवि !) – Original poem in Odia by Rajashree Mohapatra / Translated into Hindi by Rao Shivraj Pal Singh

Original poem in Odia by Rajashree Mohapatra
 
 
ରାଜଶ୍ରୀ ମହାପାତ୍ର
 
ବଇଶାଖୀ ନଈ ପରି ମୋ କବିର ଶୋଷ
ଶ୍ରାବଣୀର ଲୁହ ପରି ଝରେ ତା ଦୁଃଖ
ମରୁଝର ପରି ଉଠେ ତା’ର କୋହ
ସବୁ ସେ ଛାତିରେ ଲୁଚାଏ
ଆଉ ବି ଲୁଚାଏ ନିଜ ନିଃସଲିଳ ଦେହ
 
ମସୀନେସା କାନ୍ଥ ତଳେ ସାଇତା
ଯେତେସବୁ ମୋ କବିର କବିତା
 
ମୁଁ ପଢେ
 
ଅସ୍ପଷ୍ଟ ଅନ୍ଧାରରେ ,ଜହ୍ନର ରୂପା ଆଲୁଅରେ
ଉଛୁଳା ସାଗରର ତୁଷାର୍ତ୍ତ ଢେଉରେ
ଲାଭା ପ୍ରବାହରେ ,
ଜଳିଉଠି ଲିଭୁଥିବା ପଦମାନଙ୍କୁ ଯୋଡେ ,
ମୋ ପ୍ରିୟ କବିକୁ ପଢେ
ସଂଧ୍ୟାରାଗରେ , ପୃଥିବୀ ଆଖିରେ ।
 
ହେଲେ ତୁମେ କ’ଣ ଜାଣିପାର କବି !
ମେରୁର ପୂର୍ବ ଦିଗରେ ଭଦ୍ରାଶ୍ୱରେ
ଥାଏ ମୁଁ ତୁମ ଅପେକ୍ଷାରେ
କୁହୁଡି ପହଁରେ ସ୍ୱପ୍ନରେ ବୁଡେ
ମେଘରେ ଉଡେ
ସବୁ ଶବ୍ଦଙ୍କୁ ଆଡେଇ ସେଇମାନଙ୍କ ଭିତରେ
ତୁମକୁ ଖୋଜେ
ହଜୁଥାଏ ଭିଜୁଯାଏ
କିଏ ଜାଣେ କାହାର ଇଚ୍ଛାରେ !
 
ଶୁଣ କବି !
ଏବେ ମୁଁ ଫର୍ଦ୍ଦେ ବତୁରା କାଗଜ
ନା ପଢିହୁଏ ସେଥିରେ ଲେଖା ମୋ ନାଁ
ନା କେବେ ବି ଲେଖିହେବ
ତୁମର ଠିକଣା ।
 
<■>
©® Rajashree Mohapatra
Bhubaneswar, India .
 
 
 
है कवि !
 
वैशाख की सूखती नदी की तरह मेरे कवि की प्यास,
श्रावण के झड़ जैसा उसकी आंखों से झरता दुख का सैलाब,
मरुधरा में उठती रेत के बवंडर से उठती उसकी सिसकियां,
छुपाती है वह अपनी सूख रही भावनाएं,
सब को जज्ब कर रही वह अंदर ही अंदर अपने।
 
अपने प्रिय कवि की कविताओं को शून्य में भी पढ़ रही मैं
जैसे लिखी हो दीवाल पर काली स्याही से साफ साफ,
काली घटाओं के अंधेरे में तो चांद की छिटकती चांदनी में भी,
सागर तृषार्त प्रियतम की तरह रह रहे कर
लहरों में समा आ रहा किनारे से मिलने बार-बार
उबलते लावा भी बुझ रहा मेरे कवि के आंसुओं के सैलाब में,
पढ़ रही मैं पंक्तियों से पंक्तियां जोड़ जोड़ कर
पढ़ रही हूं जैसे संध्या के डूबते सूरज की आंख से।
 
तुम क्या जानो हे कवि !
कर रहा कोई अनवरत तुम्हारी प्रतीक्षा मेरु के पूर्व भद्रास्व में,
सपनों में लिपटी तुम्हारी यादों के कोहरे में,
उड़ रही बादलों संग ढूंढने तुम्हें तुम्हारी शब्दों के बीच,
खो रही हूं भीगती सी बादलों की भीनी भीनी फुहार बिच,
अपनी ही मर्जी से तुम्हारी तलाश में खो दिया अपने आपको !
 
सुनो हे कवि !
मैं हो गई हूं एक भीगे से कागज की मानिंद,
जो कोरा तो है एक अल्हड षोडशी के मन की तरह,
मगर ना पढ़ सके कोई उसमें मेरा और तुम्हारा नाम,
ना ही लिख सके अब उसमें अपना पता और ठिकाना!!
 
©® राजश्री मोहापात्र
 
 
Translated into Hindi by Rao Shivraj Pal Singh

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