Poem by Shamin Reza / Translated into Hindi by Pankhuri Sinha

 
Poem by Shamin Reza
 
 
पोरानी और नदी बोधूसारा
 
पोरानी, कृपा करो, चली आओ उस नोक्षिकान्था से बाहर, बाहर उस पुरातन चादर से
 
मैं नील कंठ शिव प्रेम में हूँ, दग्ध है मेरा कंठ ज़हर से, पत्थर के उस महल ने थका दिया है मुझे–
 
मेरे भीतर रहती है कौन सी प्रेयसी, क्या देखा है कभी मैंने उसे?
मैं केवल चलता गया हूँ
मथुरा की ज़मीन पर
शायद उसके साथ
जो रहती है मेरे भीतर!
 
पोरानी, ओ उस प्रचीनतम समय
उस नौक्षीकान्था की लड़की!
वो अब जुटते नहीं
प्रांगण में पूजा के
आओ कृपा कर, देखो मेरे ह्रदय का तूफान !
मैं आँधी में फंसा हूँ !
मेरी प्रियतमा को मिल गया है
अपना साथी।
एक छाया में छिप गई है
धूप की कराह!
मेरी आँखो में जल रही है
एक अंगीठी!
निद्रा विहीन रातें मंडराती हैं
हर कहीं, और तुम सो रही हो
अपने पुराने खोल में!
पोरानी, नक्काशीदार दायरे से
बाहर आओ
मेरी नदी के दोनो पाट
टूट कर गिर गए हैं
गहरे पानी में
अबाध, निर्बाध पानी
मेरा दिल एक जली हुई चिता में
तब्दील है
आँखे खोलो, ओ सपनों की मलिका
बेटी प्राग ऐतिहासिक माँ की
मेरी हड्डी, मेरे हृदय का आभूषण हो तुम!
इन प्रेमिकओं का जन्म हुआ है
नदी तल की खुशबु से
शताब्दी के किसी खास
नक्षत्रीय समय में!
खतरनाक, विषैले, असह्य
कंकाल विचरते हैं चारो ओर!
फिर भी, मैं प्रेम का मारा
ढूँढता हूँ वह नदी
मिथकीय कथाओं, परियों के किस्सों की ;
चाँद जैसे चेहरे वाली, वह गाँव की लड़की कहाँ है?
जिसके आँसू अब भर देंगे
बोशूधोरा नदी को?
 
 
 
Porani and the River Bodhusara
 
Porani, please, come out of the nakshikantha¹; I am blue-necked
Shiva in love
My throat is pierced with poison; the stony palace has exhausted
me…
Which beloved lives inside me, have I ever seen her?
I only have walked in the fields of Mothura, perhaps with her
who lives within me.
Porani, girl from nakshikantha, they no longer gather in the
precincts of worship
Please come, see my heart-storm and thunder
My beloved has found her companion.
Shadow hides the sigh of sunlight.
In my eyes there burns a furnace.
Sleepless night whirls all around; yet you are asleep in your old
nakshikantha!
Porani, come out of the embroidered realm
Both banks of my river collapsed to fathomless water
Unimpeded water; my heart is a just burnt funeral pyre, open
your eyes, you the dream queen, daughter of the primitive mother;
the bone, the ornament of my heart is you. These beloveds are
born
of the fragrance of river-core at the ecliptic moment of the century
Unbearable poisonous skeleton specters move all around.
Yet out of love I look for that river of fairytale;
where’s that moon-faced village girl?
whose tears will now fill up the Boshudora river?
 
 
 
ज़िंदगी की नाँव
 
अब तक हमने जाना है
रूठने का अपना मज़ा
और जाना है अधिकार लेना
चुपचाप!
लेकिन मेरा मन जानता नहीं
किन जीवाश्मों के भग्नावशेष
ठहरे हैं मेरी पलकों में!
नर्मदा नदी बहती है
मेरे जन्म के क्षणों की नैया में!
पानी की लहरें मस्तिष्क के
क्षितिज में बहती हैं!
संस्मरणों में उभरती हैं कथाएं
अरबों साल पुराने समय की!
और चीटियों के घरों
बालू के नन्हे टीलों को
जला दिये जाने के बाद
मैं भटकता हूँ, रूठता हूँ
और मेरी सारी इर्ष्या पिघलती है
पीले बादलों की तरह
उस नदी के मिट्टी सने पानी में
जिसे मैंने खोद लिया है
अपने भीतर!
 
 
The Raft of Birth Day
 
So far we’ve learnt sulking has its own fun, and possession
should be secretly earned.
Yet my mind knows not the ruins of erectus¹ still linger under
eyelash. The river Normoda floats on the raft of the birth-hour.
The streak of watery waves runs through the horizon of brain.
In the memoir there appear stories of olden time of millions of
years.
And after the ant-hills are burnt with watery flare behind this
streak, I sulk, and all my jealousy melts like yellow clouds
on the muddy water of a river I have dug inside me.
 
 
 

Translated into Hindi by Pankhuri Sinha

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