Poems by Sunanda Pattanaik Janah

Poems by Sunanda Pattanaik Janah
 
 
सत्य
एक आश्चर्य एक चमत्कार
गंदगी की कोख से जन्मा
एक रहस्यमयी सच
कीचड़ में खिला कमल
मधुमखी के छत्ते से निकला मधु
जैसे मंथन से अमृत
 
सत्य
एक क्षण एक मार्गदर्शक
ज्यों मिल गए हो पंख लार्वा को
तितली बन
रंगों को ओढ़े पंख फैलाये हवा में
जहाँ ख़त्म वहीँ आरम्भ
 
सत्य
एक सृष्टि एक रचना
प्रकृति के नियम की व्यवस्था
जैसे धूप के बगैर छाँव नहीं
झूठ जिसकी परछाई
तभी सत्य परिप्रकाशित होता
अंधेरों में ज्योति की तरहा
एक के बगेर दूसरा नहीं
ना रहे दो ना बचे अहंकार
ना बचे एक ना रहे अभिमान
सत्य रक शुन्य
एक आश्चर्य एक चमत्कार ।
 
 
 
माँ से माँ तक
पूजे तुझे
करे अर्पण भोग- वस्त्र -धन
जोत जलाये निकट
रखे व्रत उपवास दिन नौ
बल विद्या धन बुद्धि
सब निरर्थक
जब सोच सत्य से हो अलग
 
तू जननी
तू शक्ति
तू मुक्ति
तू पाप- विनाशिनी
फिर मौन हो क्यों
माँ भी तू बेटी भी तू
फिर यह रुके ना क्यों
 
तू आरम्भ
तू अनंत
कैसे रोके कोई मिटाये कैसे
गले से लगाऊं
आँचल में छुपाऊं
नो महीने का इंतज़ार
बस सारा ढोंग पाखंड विचार
कभी कोख में
कभी गोद तक
नन्ही जान की और
बढ़ते ही आते हैं बड़े दो हाथ
 
एक माँ की व्यथा एक बेटी की कथा
शरीर का एक हिस्सा
जो बह गया
आज तक उस नदी की और देखती हूँ
माँ को विदा करते सिंदूर लगाके
कानो में कहती हूँ
तुम तक पहुंचा दे
मेरी तो तुम सुनती नहीं
काश कभी तुम लौटोगी
माँ के हाथ पकड़ इस उमीद से ।
कदम्ब
 
 
 
तुम आना !
 
ये कदम्ब का पेड़ खड़ा है
तुम्हारे नन्हे पांव को चूमते
जवान पैरों को सँभालते
आज फिर वही शोर
वही हर्षोल्लास
धरा – गगन , मथुरा- बृंदावन
 
तुम आना !
फिर अधरों से लगा कर बांसुरी
मीठी कोई धुन सुनाना
ये नदी सदियों से बहती है
एक धारा -एक धागा – एक जीवन
रूप अलग मगर
रंग तेरे ही सारे घनश्याम
तेरे तो कई नाम
 
तुम आना !
कदम्ब साक्षी है हर क्षण का
संग सखी बैठ कुञ्ज-वन में
बाट निहारे राधा
सारे श्रृंगार करे त्याग
मान करे अभिमान से
सखी ललिता देख मुस्कुराये
 
तुम आना !
हर बार तेज़ बारिश आज भी है
एक गोद एक जीवन
तू आधार देवकी – नंदन
एक जोत एक आँचल
तू प्रकाश यशोदा – नंदन
तू नटखट तू नटवर
तेरे संसार का ताना-बाना
हिसाब भी तेरा
तुम आना !
 
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