Poems by Anjana Verma (Hindi)

Anjana Verma

Anjana Verma is a well known poet and fiction writer of Hindi. She has authored and published 18 books in different genres. Poems, lyrics, short stories, criticism, travelogue are continuously being published in various journals, magazines, e-zines at national and international levels. Recipient of many prestigeous awards for her outstanding contributions to Hindi literature.
At present she is University Professor and Head, department of Hindi at Nitishwar College,Muzaffarpur, India. She lives in Muzaffarpur ( India).

 

किन्नर
अंजना वर्मा

दिशाहीन
किसी तरह अस्तित्व – रक्षा में लीन
ठिकाना मालूम नहीं है अपना
कभी रेलगाड़ी में
कभी चौराहे पर
तो कभी किसीके द्वार पर
हर जगह उनकी फैली हथेलियाँ
ओठों पर याचना
बीत जाएगी इसी तरह उम्र इनकी

दु:ख नहीं है इनके लिए किसीको
न किसीके पास समय है
इनके लिए कुछ सोचने का
परंतु इन्हें समाज से वहिष्कृत करने के लिए
समय भी था
और ताकत भी थी
समाज क्रूर बन गया
तो माता- पिता भी पत्थर
जिन्होंने जन्म देकर त्याग दिया
क्या है पहचान उनकी ?
सृजनहार की गलती का
और समाज के अन्याय का
फल भोगते हुए
वे भटक रहे हैं कहाँ- कहाँ?

पता खो गई चिट्ठियों की तरह
कोई गंतव्य नहीं है उनका
गौर से देखो
वे बिना पते की
फाड़ी गई चिट्ठियाँ हैं
एक अदृश्य डस्टबिन में

 

कलम दौड़ी जा रही है
अंजना वर्मा

जनवरी का महीना है
आधी रात से ऊपर का वक्त
सन्नाटा लगा रहा है गश्त
झन्न बोल रही है उसकी सीटी
इंसान जड़ हो गया है बिस्तर में
पेड़ों की पत्तियाँँ भी जमकर
काठ हो गई हैं
ठंड के बिच्छुओं के अनगिनत डंकों से
सड़क हो गई है अचेत

नीली चादर पर
दुधिया झीनी मशहरी में
चाँद सोया हुआ है
गहरी नींद में

जाग रही है तो बस एक बेचैन कलम
जो लगातार भागी जा रही है
ऐम्बुलेंस की तरह
शब्दों का बजाती हुई हार्न
और चीखती हुई
क्योंकि उसे बचाना है जीवन

जब तक कलमें दौड़ रही हैं
तब तक एक- एक जान है अनमोल
भरोसा रखो उन कलमों पर
जो सोती नहीं

अभी भी कितनी आँखों में नमी है
और कितने हाथ सक्रिय हैं
किसी को सँभालने के लिए
यह सब इसीलिए कि
कलमें जाग रही हैं

 

नमक की तरह
अंजना वर्मा

पूरी पृथ्वी को चखकर देख सकते हो
स्त्री के हाथों का
स्पर्श – स्वाद मिल जाएगा
अपने गर्भ में रचकर
जन्म देने के बाद भी
शिशु को लगातार
एक कुम्हार की तरह गढ़ते हुए
जैसे कुम्हार देता है आकार
मिट्टी को बनाता है घड़ा
स्त्री रचती है
मानव का शरीर, मन, बुद्धि
एक मिट्टी के लोंदे को देती है जिन्दगी

ईंट- सिमेंट की बेजान चारदीवारियों को
साँस लेते घरों में बदलने वाली
कोई औरत ही होती है
जहाँ फर्श की चिकनाहट में
समायी होती है उसकी हाथों की थकन
और रोटियों में समायी होती है
उसकी जलन
खिलखिलाता है बच्चा
तो महँगे खिलौनों से नहीं
ओठों की उस छुअन से
जो उसे माँ से मिलती है
लंच- बाक्स में
अपना प्यार भरकर देने वाली औरत
सबकी शिराओं में दौड़ती रहती है
खून बनकर

जहाँ- जहाँ गये उसके पैर
वहाँ फैल गयी खुशबू
जगह कोई हो
वहाँ छूट जाती है उसकी छाप
औरत घुली हुई है
जिन्दगी की धार में स्वाद की तरह
पर उसकी कीमत
एक चुटकी नमक से ज्यादा
नहीं आँकी जाती है

Copy right : Anjana Verma

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s